कुंडली के बारह भाव
जन्म के क्षण उदित राशि (लग्न) पहला भाव बनती है, और शेष ग्यारह भाव उसके बाद आते हैं। बृहत् पराशर होरा शास्त्र के ग्यारहवें अध्याय में हर भाव का विषय बताया गया है:
लग्न (प्रथम भाव) से शरीर, रूप, ज्ञान, वर्ण, बल-अबल, सुख, दुःख और स्वभाव का विचार करें।
बृहत् पराशर होरा शास्त्र 11.2
धन भाव (द्वितीय) से धन-धान्य, कुटुंब, शत्रु, धातु, रत्न आदि का विचार करें।
बृहत् पराशर होरा शास्त्र 11.3
चतुर्थ भाव से वाहन, बंधु, माता, सुख, निधि, भूमि और गृह का विचार करें।
बृहत् पराशर होरा शास्त्र 11.5
सप्तम (जाया) भाव से पत्नी, यात्रा और व्यापार का विचार करें।
बृहत् पराशर होरा शास्त्र 11.8
दशम भाव से राज्य, आजीविका, मान, पिता, प्रवास और ऋण का विचार होता है।
बृहत् पराशर होरा शास्त्र 11.11
एकादश भाव से अनेक वस्तुओं की प्राप्ति, आय और वृद्धि का विचार होता है।
बृहत् पराशर होरा शास्त्र 11.12
आपकी दशाएँ
कृत्तिका से जन्म नक्षत्र तक की संख्या को नौ से भाग दें; शेष से दशा का स्वामी जानें और उससे आरम्भ करके दशाएँ चलाएँ।
बृहत् पराशर होरा शास्त्र 46.13
इनकी दशा के वर्ष क्रम से 6, 10, 7, 18, 16, 19, 17, 7 और 20 हैं।
बृहत् पराशर होरा शास्त्र 46.15
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क्या सही जन्म समय ज़रूरी है?
समय से लग्न तय होता है, जो लगभग दो घंटे में एक राशि आगे बढ़ता है, इसलिए भाव भी बदलते हैं।
कौन-सा अयनांश?
लाहिरी (चित्रापक्ष), जिसे भारत सरकार की पंचांग सुधार समिति ने अपनाया।